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UPI Charges 2026: अब पेमेंट करने से पहले सोचना होगा? जानें पूरा विवाद, नया नियम और आपकी जेब पर असर

Rahul Sharma — Journalist
Rahul Sharma
September 16, 20267 min read
UPI Charges 2026: अब पेमेंट करने से पहले सोचना होगा? जानें पूरा विवाद, नया नियम और आपकी जेब पर असर — article by Rahul Sharma

14 सितंबर की नोटिफिकेशन के बाद UPI पर चार्ज को लेकर सरकार-विपक्ष आमने-सामने। जानें क्या सच में बदला, किस पर पड़ेगा असर, और वह संसदीय सवाल जो दो महीने पहले ही यह इशारा दे चुका था।

चाय की दुकान पर पन्द्रह रुपये का भुगतान हो या दोस्त को उधार लौटाने के दो हजार रुपये, पिछले छह साल से एक बात तय थी कि UPI से पेमेंट करने का कोई पैसा नहीं लगेगा। लेकिन 14 सितंबर 2026 की एक सरकारी नोटिफिकेशन ने इस भरोसे में एक सेंध डाल दी है, और उसी सेंध पर अब संसद से लेकर सोशल मीडिया तक जंग छिड़ी है। कांग्रेस कह रही है कि सरकार आम आदमी की जेब पर बोझ डालने वाली है, सरकार कह रही है कि आम यूजर का कुछ नहीं बिगड़ेगा, और बीच में हैं करोड़ों लोग जो रोज UPI से पेमेंट करते हैं मगर असल में क्या बदला है, यह किसी को ठीक से समझ नहीं आ रहा। इस पूरी उलझन को यहां सिलसिलेवार समझते हैं। साथ ही एक ऐसा एंगल भी, जो शायद अब तक कहीं नहीं पढ़ा होगा।

असल में बदला क्या है — 14 सितंबर की नोटिफिकेशन का गणित

वित्त मंत्रालय ने भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए के तहत एक गजट अधिसूचना जारी की। इसमें साफ लिखा है कि रुपे डेबिट कार्ड और ₹2,000 तक के UPI लेनदेन पर बैंक या पेमेंट कंपनी किसी भी तरह का चार्ज, सीधे या घुमा-फिराकर भी, नहीं वसूल सकती। सुनने में यह राहत की खबर लगती है, और है भी। मगर पेच यहां है: यह छूट सिर्फ ₹2,000 तक के लेनदेन के लिए है। इससे ऊपर के लेनदेन को इस सुरक्षा-कवच से बाहर रखा गया है, यानी कानूनी तौर पर अब उन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का रास्ता खुल गया है।

इसे इस तरह समझें... अगर आप किसी दोस्त या रिश्तेदार को पैसे भेजते हैं (P2P), तो चाहे रकम कितनी भी हो, वह पूरी तरह मुफ्त रहेगी। NPCI के आंकड़ों के मुताबिक ऐसे लेनदेन कुल UPI वॉल्यूम का करीब 37% हैं, लेकिन कुल रकम के हिसाब से करीब 70% हिस्सा यही बनाते हैं। असली निशाना है व्यक्ति-से-दुकानदार (P2M) वाले बड़े लेनदेन, जो संख्या में मुश्किल से 4% हैं, पर रकम के लिहाज से दुकानदारों को मिलने वाली कुल राशि का करीब 67% हिस्सा यही तय करते हैं। यानी सरकार ने एक झटके में पूरे UPI को नहीं छुआ, बल्कि सिर्फ उस हिस्से को निशाना बनाया है जहां बड़ी रकम और बड़े व्यापारी शामिल हैं।

अगले ही दिन, 15 सितंबर को NPCI ने अपनी UPI एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी की बैठक बुलाई। यह 22 सदस्यों वाली कमेटी है, जिसमें इंडियन बैंक्स एसोसिएशन, पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ निजी और सरकारी बैंकों तथा फिनटेक कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। इसी कमेटी को अब तय करना है कि ₹2,000 से ऊपर के लेनदेन पर कितना MDR लगेगा, यह किन दुकानदारों पर लागू होगा और वसूली गई रकम बैंकों-फिनटेक कंपनियों में किस अनुपात में बंटेगी। बाजार के जानकारों का अनुमान है कि यह दर 0.25% से 0.40% के बीच कहीं तय हो सकती है।

सियासी मैदान गरम — किसने क्या कहा

नोटिफिकेशन आते ही कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला और कहा कि सरकार ने यूजर्स का भरोसा और पारदर्शिता, दोनों तोड़ी है। राहुल गांधी ने इसे और तीखा मोड़ देते हुए दावा किया कि सरकार अमेरिकी दबाव में झुक रही है और डिजिटल पेमेंट को महंगा कर रही है। भाजपा की ओर से आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय मैदान में उतरे और कांग्रेस के 0.5% चार्ज वाले दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि नोटिफिकेशन में ऐसी कोई दर तय ही नहीं की गई। इस बीच भारतपे के सह-संस्थापक अशनीर ग्रोवर ने भी अपनी राय रखी और इसे टैक्स वसूलने का एक तरीका बताते हुए सवाल उठाए।

दिलचस्प यह है कि यह बहस अचानक नहीं शुरू हुई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अगस्त की शुरुआत में ही जयराम रमेश के एक सवाल के जवाब में संसद में कह चुकी थीं कि MDR सिर्फ व्यापारियों पर लागू होगा, ग्राहकों पर नहीं, और इससे मिलने वाला पैसा बैंकों-फिनटेक कंपनियों को बुनियादी ढांचे और सुरक्षा में निवेश करने में मदद करेगा। यानी सरकार का रुख शुरू से एक जैसा रहा है, सिर्फ अब उसे कानूनी शक्ल दी गई है।

दो महीने पहले संसद में ही खुल चुका था यह राज़

21 जुलाई 2026 को राज्यसभा में सांसद राजीव कुमार ने वित्त मंत्री से सीधा सवाल पूछा था , क्या यह सच है कि UPI के तकनीकी संचालन पर हर साल रखरखाव में करीब ₹210 करोड़ और उपकरणों के मूल्यह्रास में करीब ₹290 करोड़ खर्च होते हैं, और क्या हर लेनदेन पर सिर्फ एक या दो पैसे का मामूली शुल्क लगाकर यह पूरी लागत वसूली जा सकती है, जिससे UPI आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाए। सांसद ने अपने सवाल में यह भी जोड़ा था कि सालाना लेनदेन की संख्या करीब 1,700 करोड़ (17 अरब) तक पहुंच चुकी है, इसलिए दो पैसे का शुल्क भी लगभग पूरी लागत की भरपाई कर सकता है।

सरकार ने उस दिन इस गणित को न तो सिरे से नकारा और न ही स्वीकार किया। जवाब में सिर्फ इतना बताया गया कि UPI को मुफ्त रखने के लिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को पहले से ही एक प्रोत्साहन योजना के तहत सहायता दी जा रही है, ताकि ₹2,000 से कम के लेनदेन नि:शुल्क बने रहें। यानी सवाल टाला नहीं गया, बल्कि जवाब में यह संकेत छिपा था कि सरकार पहले से इस दिशा में सोच रही थी कि UPI को हमेशा के लिए सब्सिडी पर नहीं चलाया जा सकता। ठीक दो महीने बाद 14 सितंबर की नोटिफिकेशन इसी सोच का अगला कदम साबित हुई। संसद के रिकॉर्ड को पलटकर देखें तो यह विवाद अचानक पैदा हुआ झटका नहीं, बल्कि महीनों से पक रही एक योजना का खुलासा भर है।

आपकी जेब पर सीधा असर क्या होगा

आम आदमी के लिए घबराने की बात फिलहाल नहीं है। सब्जी वाले को, ऑटो वाले को, दोस्त को, किसी को भी ₹2,000 तक भेजे गए पैसे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, चाहे वह लेनदेन कितनी भी बार क्यों न हो। कानून खुद कहता है कि दुकानदार ग्राहक से इस चार्ज की भरपाई के नाम पर अलग से एक रुपया भी नहीं मांग सकता। असल फर्क वहां पड़ेगा जहां कोई बड़ा शोरूम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या थोक व्यापारी ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान स्वीकार करता है, वहां MDR की रकम व्यापारी को खुद वहन करनी पड़ेगी। बड़ा सवाल यही है कि क्या व्यापारी इस लागत को अपने मुनाफे में समायोजित करेंगे या घुमा-फिराकर उत्पाद की कीमत में जोड़ देंगे। यही वह पहलू है जिस पर विपक्ष और सरकार के बीच असली रस्साकशी चल रही है।

आंकड़ों में समझें — UPI कितना बड़ा खिलाड़ी बन चुका है

इस विवाद की गहराई समझने के लिए UPI का कद जानना जरूरी है। जून 2026 तक देश में UPI के 55.49 करोड़ सक्रिय यूजर्स हो चुके थे। सिर्फ बीते वित्त वर्ष (2025-26) में ही 24,161 करोड़ से ज्यादा लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत ₹314 लाख करोड़ के आसपास रही। पांच साल पहले यह आंकड़ा महज ₹84 लाख करोड़ था। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान में अकेले भारत की हिस्सेदारी करीब 49% है, यानी हर दूसरा रीयल-टाइम डिजिटल लेनदेन भारत में हो रहा है। यही वजह है कि UPI अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं, भूटान, सिंगापुर, यूएई, फ्रांस, मॉरीशस, श्रीलंका, नेपाल, कतर, ग्रीस और कंबोडिया जैसे दस देशों में भी इसका इस्तेमाल शुरू हो चुका है। इतने बड़े नेटवर्क को चलाने और सुरक्षित रखने की लागत भी उसी अनुपात में बढ़ती चली गई है और असली विवाद की जड़ यही है।

पाठकों के मन में उठ रहे सवाल

क्या आम यूजर से UPI इस्तेमाल करने पर पैसा कटेगा? नहीं। जो भी चार्ज लगेगा, वह सीधे दुकानदार से वसूला जाएगा, ग्राहक से नहीं।

क्या दोस्त या परिवार को पैसे भेजना महंगा होगा? नहीं, व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेनदेन पूरी तरह मुफ्त बना रहेगा, चाहे रकम कितनी भी हो।

MDR होता क्या है? मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी वह छोटा-सा प्रतिशत, जो कार्ड या डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर बैंक और पेमेंट कंपनी दुकानदार से वसूलती हैं, ताकि नेटवर्क और सुरक्षा का खर्च निकल सके।

अगला फैसला कब आएगा? NPCI की स्टीयरिंग कमेटी इसी महीने विचार-विमर्श कर रही है। दर, दायरा और तारीख को लेकर आधिकारिक ऐलान आने वाले हफ्तों में संभव है।

आगे की राह

छह साल तक बिल्कुल मुफ्त रही UPI सेवा अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां सरकार बड़े व्यापारिक लेनदेन से थोड़ी कमाई निकालकर इस विशाल नेटवर्क को खुद अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती है। आम ग्राहक के लिए फिलहाल राहत की बात यही है कि रोजमर्रा के छोटे भुगतान पूरी तरह सुरक्षित हैं। असली परीक्षा तब होगी जब NPCI की कमेटी अंतिम दर और नियम तय करेगी और तभी पता चलेगा कि यह लड़ाई सिर्फ दुकानदारों तक सिमटी रहती है, या घूम-फिरकर आम आदमी की जेब तक भी पहुंचती है।

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