मध्यप्रदेश में एक ही विभाग के खिलाफ दो पीढ़ियां सड़क पर हैं: सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं, उस व्यवस्था का है जो भविष्य और भविष्य बनाने वालों—दोनों को इंतजार करा रही है

मध्यप्रदेश में Gen Z और Gen Alpha दोनों स्कूल शिक्षा विभाग के खिलाफ सड़क पर हैं। एक ओर छात्र सरकारी स्कूलों की बदहाली, विलय और सुविधाओं की कमी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षक भर्ती के वेटिंग अभ्यर्थी और अतिथि शिक्षक नियुक्ति व भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आखिर मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में ऐसा क्या हो रहा है कि विद्यार्थी और नौकरी की तलाश में जुटे युवा, दोनों एक ही विभाग से जवाब मांग रहे हैं?
मध्यप्रदेश में इन दिनों दो पीढ़ियां एक साथ सड़क पर दिखाई दे रही हैं। एक तरफ स्कूलों में पढ़ने वाली नई पीढ़ी है, जिसे आज की भाषा में Gen-Alpha कहा जा रहा है। दूसरी तरफ वे युवा हैं, जिन्हें Gen-Z कहा जाता है और जो शिक्षक भर्ती, वेटिंग लिस्ट और अतिथि शिक्षक व्यवस्था में अपने भविष्य का जवाब मांग रहे हैं। दोनों की मांगें अलग हैं, लेकिन गुस्से का पता एक ही है—स्कूल शिक्षा विभाग।
यह संयोग नहीं है। बल्कि यह उस शिक्षा व्यवस्था की दो तस्वीरें हैं, जिसमें एक तरफ विद्यार्थी पूछ रहा है कि उसे पढ़ने के लिए ठीक स्कूल, शिक्षक और सुविधाएं क्यों नहीं मिल रहीं, तो दूसरी तरफ पढ़ाने की योग्यता रखने वाला युवा पूछ रहा है कि जब स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत है तो उसकी नियुक्ति क्यों नहीं हो रही।
23 अगस्त को भोपाल के नीलम पार्क में स्कूल बचाओ संघर्ष समिति के सम्मेलन में प्रदेश के 36 जिलों से छात्र, शिक्षक और अभिभावक जुटे। मांगें थीं—सरकारी स्कूलों को बंद करने की नीति पर रोक, जर्जर स्कूलों की मरम्मत, जरूरी सुविधाएं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार।
इसके कुछ ही दिनों पहले 19 अगस्त को भोपाल में रीजनल स्कूल के करीब 400 विद्यार्थी संभावित विलय के विरोध में सड़क पर उतरे और 'सेव डीएमएस' के नारे लगाए। बच्चों की चिंता सिर्फ अपनी वर्तमान कक्षा तक सीमित नहीं थी; सवाल यह था कि उनके स्कूल की पहचान, पाठ्यक्रम और भविष्य का क्या होगा।
पहली तस्वीर: बच्चे पूछ रहे हैं—हमारा स्कूल क्यों घट रहा है?
मध्यप्रदेश की सरकारी स्कूल व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि कितने स्कूल बंद हुए। असली सवाल है कि सरकारी स्कूलों से विद्यार्थी लगातार क्यों दूर हो रहे हैं?
विधानसभा में सामने आए आंकड़ों के अनुसार 2010-11 में कक्षा 1 से 12 तक सरकारी स्कूलों में करीब 1.33 करोड़ विद्यार्थी थे। 2025-26 में यह संख्या घटकर करीब 79 लाख रह गई। यानी एक दशक से अधिक समय में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी आधार में करीब 54.27 लाख की कमी आई।
स्कूलों की संख्या में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। उपलब्ध UDISE-आधारित आंकड़ों के अनुसार 2016-17 में प्रदेश में 1,22,880 सरकारी स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 91,199 रह गए—यानी करीब 31,681 स्कूल कम।
सरकार के सामने इसका एक तर्क स्वाभाविक है—जब बच्चों की संख्या कम हो रही है तो छोटे-छोटे स्कूलों को मर्ज करना प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से उचित हो सकता है। लेकिन शिक्षा को केवल स्कूलों की संख्या और प्रति विद्यार्थी लागत के गणित से नहीं देखा जा सकता।
गांव के बच्चे के लिए स्कूल सिर्फ एक भवन नहीं है। वह घर के पास उपलब्ध शिक्षा का अधिकार है। स्कूल मर्ज होने के बाद यदि बच्चे को कई किलोमीटर दूर जाना पड़े, परिवहन उपलब्ध न हो या अभिभावक उसे भेजने की स्थिति में न हों, तो कागज पर 'मर्जर' है, जमीन पर ड्रॉपआउट का जोखिम।
विदिशा में बस किराए के खिलाफ सड़क पर उतरे सरकारी स्कूल के बच्चों का सवाल इसी वास्तविकता को सामने लाता है—जब रोज 25 रुपए किराया देना पड़े तो गरीब परिवार का बच्चा पढ़ाई जारी कैसे रखे?
दूसरी तस्वीर: शिक्षक चाहिए, लेकिन युवा इंतजार में है
अब दूसरी तरफ आइए।
मध्यप्रदेश में शिक्षक भर्ती को लेकर नाराजगी नई नहीं है। जनवरी 2026 में शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों ने भोपाल में प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के मुताबिक 2023 की वर्ग-1 शिक्षक भर्ती में 2,901 पदों पर सीमित नियुक्ति को लेकर वेटिंग अभ्यर्थियों में असंतोष था। कई अभ्यर्थी दो साल से नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे।
यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—यदि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है तो शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया इतनी धीमी, सीमित या विवादित क्यों है?
और अगर नियमित भर्ती की प्रक्रिया समय ले रही है तो विभाग अतिथि शिक्षकों पर निर्भर है।
स्कूल शिक्षा विभाग का GFMS पोर्टल खुद बताता है कि सरकारी स्कूलों में रिक्तियों के विरुद्ध अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था लगातार करनी पड़ती है। 2026-27 के लिए भी रिक्तियों के अपडेशन, पंजीयन, सत्यापन और अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था से संबंधित आदेश जारी हुए हैं।
वर्तमान शैक्षणिक सत्र में करीब 5 हजार रिक्तियों पर अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। विभाग का तर्क भी स्पष्ट है—जहां नियमित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, वहां पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
लेकिन यही व्यवस्था एक दूसरा सवाल पैदा करती है।
क्या अतिथि शिक्षक स्थायी समाधान हैं या वर्षों से चली आ रही अस्थायी व्यवस्था का स्थायी रूप?
अगर कोई युवा वर्षों तक परीक्षा देता है, पात्रता हासिल करता है, चयन प्रक्रिया में शामिल होता है और फिर वेटिंग लिस्ट में खड़ा रहता है, जबकि उसी व्यवस्था में स्कूलों की जरूरत पूरी करने के लिए अस्थायी शिक्षक बुलाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में व्यवस्था की पारदर्शिता और नीति पर सवाल पैदा होंगे।
यह विरोध दरअसल दो अलग संकटों का एक ही एक्स-रे है
Gen-Alpha का सवाल है—
"हमें अच्छा स्कूल क्यों नहीं मिल रहा?"
Gen-Z का सवाल है—
"जब स्कूल को शिक्षक चाहिए तो हमें नौकरी क्यों नहीं मिल रही?"
इन दोनों सवालों का केंद्र एक ही है—मानव संसाधन, स्कूलों की गुणवत्ता और नीति का असंतुलन।
यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल 'युवाओं का आंदोलन' या 'बच्चों का प्रदर्शन' कहकर खत्म कर देना आसान होगा, लेकिन गलत भी।
सरकार यदि स्कूलों की संख्या घटा रही है तो उसे सार्वजनिक रूप से बताना होगा कि कौन-से स्कूल क्यों मर्ज किए जा रहे हैं, वहां कितने विद्यार्थी हैं, उनकी दूरी कितनी बढ़ेगी, परिवहन की व्यवस्था क्या होगी और उस फैसले के बाद ड्रॉपआउट रोकने की क्या योजना है।
यदि शिक्षक कम हैं तो सरकार को जिलेवार और विषयवार रिक्तियां सार्वजनिक करनी चाहिए। नियमित भर्ती की समयसीमा स्पष्ट होनी चाहिए। वेटिंग अभ्यर्थियों के मामले में नीति पहले से स्पष्ट होनी चाहिए—कितनी रिक्तियों पर वेटिंग सूची आगे बढ़ेगी, किन परिस्थितियों में नहीं बढ़ेगी और इसका कारण क्या होगा।
और अतिथि शिक्षक व्यवस्था में भी पारदर्शिता उतनी ही जरूरी है। GFMS जैसी डिजिटल व्यवस्था तभी भरोसा पैदा करेगी जब रिक्त पद, मेरिट, चयन और नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से समझ में आने वाली हो।
शिक्षा विभाग को अब 'मैनेजमेंट' से आगे बढ़कर 'मिशन' की तरह काम करना होगा
मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के सामने समस्या सिर्फ स्कूल बंद होने की नहीं है। समस्या यह है कि स्कूल बचाने वाला विद्यार्थी, स्कूल चलाने वाला शिक्षक और स्कूल में नौकरी चाहने वाला युवा—तीनों एक साथ असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं।
यह किसी भी सरकार के लिए गंभीर संकेत होना चाहिए।
किसी बच्चे का सड़क पर आना लोकतंत्र में उसकी जागरूकता का संकेत हो सकता है, लेकिन यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि बच्चा तब सड़क पर आता है जब उसे लगता है कि स्कूल के भीतर उसकी बात नहीं सुनी जा रही।
उसी तरह शिक्षक भर्ती का अभ्यर्थी तब लगातार प्रदर्शन करता है जब उसे लगता है कि परीक्षा, परिणाम, नियुक्ति और वेटिंग—इन सबके बीच उसका भविष्य किसी स्पष्ट नीति के बजाय फाइलों और आदेशों के बीच अटका हुआ है।
सरकार के पास अभी भी मौका है।
स्कूलों को सिर्फ इसलिए बंद न किया जाए कि वहां विद्यार्थी कम हैं; पहले यह पूछा जाए कि विद्यार्थी कम क्यों हैं।
भर्ती सिर्फ इसलिए सीमित न की जाए कि बजट सीमित है; पहले यह पूछा जाए कि शिक्षक की कमी से शिक्षा की कीमत कितनी बढ़ रही है।
अतिथि शिक्षक को सिर्फ तत्काल खाली पद भरने का साधन न माना जाए; यह भी तय हो कि नियमित शिक्षक व्यवस्था को मजबूत करने की समयसीमा क्या है।
और सबसे महत्वपूर्ण—बच्चों और युवाओं के आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसे फीडबैक सिस्टम की तरह देखा जाए।
क्योंकि सड़क पर खड़ी ये दोनों पीढ़ियां सरकार से सत्ता नहीं मांग रहीं।
एक पीढ़ी अपना स्कूल बचाना चाहती है।
दूसरी अपना भविष्य।
और दोनों के बीच खड़ा है वही स्कूल शिक्षा विभाग, जिसके पास अब इन सवालों को टालने की गुंजाइश शायद पहले से बहुत कम है।